हर वर्ष आने वाली महानवमी का दिन श्री ठाकुर बाबा मंदिर के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन यहाँ लगने वाला मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और उत्साह का संगम बन जाता है।
नवरात्रि के नौ दिनों तक श्रद्धालु रोजाना माता के भजन, आरती और पूजा में भाग लेते हैं। लेकिन नवमी के दिन वातावरण कुछ अलग ही होता है। मंदिर परिसर में हजारों भक्तों की भीड़ उमड़ती है। गाँव के लोग, दूर-दराज़ से आए यात्री, महिलाएँ, बच्चे — सभी ठाकुर बाबा के जयकारों से वातावरण को गुंजायमान कर देते हैं।
मंदिर की सजावट देखने लायक होती है — फूलों की मालाएँ, दीये, रंगोली, और आरती की झंकार से हर दिशा भक्तिमय हो उठती है। भक्त अपने-अपने क्षेत्र से सवामणी और भंडारे का आयोजन करते हैं। भक्तगण एक-दूसरे को प्रसाद बाँटते हैं, और ठाकुर बाबा के चबूतरे पर दीपदान करते हैं।
इस मेले में धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सामाजिक समरसता का भी दर्शन होता है। यहाँ अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं, सभी ठाकुर बाबा की चरणों में समान भाव से झुकते हैं।
यह मेला केवल पूजा का नहीं, बल्कि संस्कार, एकता और परंपरा के संरक्षण का भी प्रतीक है।
लोग मानते हैं कि जो व्यक्ति इस मेले में सच्चे मन से बाबा के दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। अनेक भक्तों ने बताया कि बाबा के आशीर्वाद से उनके जीवन की कठिनाइयाँ दूर हुईं।
ऐसे आयोजन यह दर्शाते हैं कि कैसे भारतीय संस्कृति में मंदिर केवल ईश्वर की उपासना का केंद्र नहीं, बल्कि समाजिक मेलजोल, संस्कृति और परंपरा का संगम भी होते हैं।